नई नियमावली से तो सबकी बंद हो जाएगी यशभारती पेंशन

नई नियमावली से तो सबकी बंद हो जाएगी यशभारती पेंशन


बसपा सरकार ने बंद कर दी थी योजना1यशभारती सम्मान वर्ष 1994 में तत्कालीन सपा सरकार में मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने शुरू किया था। एक लाख रुपये से शुरू हुए पुरस्कार की राशि मुलायम के उसी कार्यकाल में बढ़ाकर पांच लाख रुपये कर दी गई थी। हालांकि बसपा के सत्ता में आने के बाद मायावती ने यह कहते हुए योजना बंद कर दी थी कि यशभारती अब मुलायम सिंह के पारिवारिक मित्रों को दिया जाने वाला सम्मान बन गया है। वर्ष 2012 में सपा सरकार बनने के बाद अखिलेश यादव ने यह सम्मान फिर शुरू कराया था। साथ ही सम्मान की राशि भी बढ़ाकर 11 लाख रुपये कर दी थी।


यह हैं शर्ते

यशभारती सम्मान अब उन्हीं को मिलेगा जो सरकारी सेवा में न हों, सरकारी पेंशन न पा रहे हों और आयकरदाता भी न हों। मुंबई से लेकर देश के अन्य हिस्सों की विभूतियों तक को भी अब यह सम्मान मिलना आसान नहीं होगा, क्योंकि इसके लिए जन्मभूमि या कर्मभूमि उत्तर प्रदेश ही होनी चाहिए।


पुरस्कार से सम्मानित लोगों को बेचैन कर रहा है राज्य सरकार का निर्णय

राज्य ब्यूरो, लखनऊ : यशभारती सम्मान की नई नियमावली ने एक बार फिर इस पुरस्कार को लेकर हंगामा खड़ा कर दिया है। 11 लाख रुपये नकद पुरस्कार और 50 हजार रुपये मासिक पेंशन वाले इस सम्मान की भारी रकम ही इसका सबसे बड़ा आकर्षण थी, जबकि सरकार ने अब इसी पर कैंची चला दी है। नियमावली की जटिल शर्तो ने जहां पहले सम्मान पा चुके लोगों में से किसी को पेंशन मिलने की उम्मीद लगभग खत्म कर दी है, वहीं नए नामों का चयन भी इसके मुताबिक आसान नहीं होगा।

नई नियमावली में यशभारती सम्मान की पेंशन आधी किए जाने से जहां सम्मानित लोगों को 50 फीसद का आर्थिक झटका लगा है, वहीं आयकरदाता न होने की शर्त ने उनके लिए पूरे सौ फीसद की संभावनाएं खत्म कर दी हैं। अमिताभ बच्चन के परिवार और डॉ. नरेश त्रेहन जैसे कुछ नामों को छोड़ दिया जाए तो बाकी लगभग सभी लोग पेंशन प्राप्त कर रहे थे। यश भारती पाने वालों में खेल निदेशक आरपी सिंह जैसे सरकारी सेवक और सौरभ शुक्ला जैसे फिल्म निर्देशक तक शामिल हैं। यशभारती सम्मान पाने वाले क्रिकेटरों सहित कुछ अन्य लोग जहां भारी कमाई कर रहे हैं, वहीं कुछ को एक से ज्यादा पेंशन मिल रही है। आयकरदाता तो इनमें से कमोबेश सभी हैं। अब नई शर्तो से यह सारे नाम पेंशन सूची से कट जाएंगे।

साहित्य व काव्य से जुड़े लखनऊ के सर्वेश अस्थाना भी यशभारती सम्मान पाने वालों में से एक हैं। नए नियमों से व्यथित होकर वह कहते हैं कि जब सम्मान दिया गया था, तब तो आयकरदाता न होने की शर्त लगाई नहीं गई थी। इस मामले पर सरकार से और चिंतन का आग्रह करते हुए अस्थाना का कहना है कि यदि गलत नामों का चयन हुआ है तो इस प्रक्रिया में शामिल रहे संस्कृति विभाग के कार्मिकों पर कार्रवाई होनी चाहिए, न कि सम्मानित लोगों की पेंशन बंद कर दी जानी चाहिए। अस्थाना कहते हैं कि मौजूदा नियमों से तो सबकी पेंशन बंद हो जाएगी। वास्तव में नए नियमों ने यशभारती सम्मान की पात्रता को खासा सीमित कर दिया है। आयकरदाता न होने की शर्त ने इस सम्मान के लिए अब केवल गरीब और जमीन से जुड़े जरूरतमंद कलाकारों के लिए ही गुंजाइश छोड़ी है।

कह पा रहे, न सह पा रहे : सपा सरकार में यशभारती सम्मान पाने वाले भाजपा के एक नेता अब पेंशन बंद होने से व्यथित तो हैं लेकिन, अपनी ही सरकार का फैसला होने के नाते न इसका विरोध कर पा रहे हैं और न ही दर्द बयान कर पा रहे हैं। वह कहते हैं कि यह बड़ी आर्थिक सुरक्षा थी, जिसके बंद होने से कठिनाई बढ़ जाएगी लेकिन, अपनी सरकार का फैसला है, बर्दाश्त तो करना ही होगा।

सरकारी सेवकों का कटा पत्ता1सपा सरकार में शुरू हुए यशभारती सम्मान कई ऐसे लोगों को भी प्रदान किए गए, जो सरकारी सेवा में थे। जबकि नई नियमावली में सरकारी सेवा या सरकारी पेंशन वालों को सम्मान का पात्र नहीं माना गया है। ऐसे सभी लोगों को भी अब 50 हजार रुपये प्रतिमाह के नुकसान का सामना करना पड़ेगा। दूरदर्शन से सेवानिवृत्त और यशभारती से सम्मानित आत्मप्रकाश मिश्र सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए कहते हैं कि इस निर्णय से योग्य कलाकारों व पात्र लोगों को प्रोत्साहन मिलेगा।

इन्हें भी मिल गया सम्मान

विवादों में रहे यशभारती सम्मान की पात्रता पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। वर्ष 2016 के अंतिम समारोह में मंच पर तुरंत फैसला लेकर कार्यक्रम का संचालन करने वाली उद्घोषिका तक को सम्मान की घोषणा कर दी गई। इससे पहले तत्कालीन मुख्य सचिव की पत्नी, सैफई के ग्राम प्रधान, मुलायम सिंह पर प्रशस्ति पुस्तक लिखने वाले और सपा दफ्तर में काम करने वालों को रेवड़ी की सम्मान बांटे जाने ने भी यशभारती की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई है।

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