छूटा ‘कटोरा’, पढ़ रहे ककहरा

छूटा ‘कटोरा’, पढ़ रहे ककहरा
chhuta 'katora' padh rahe kakahraa

नेदा निवासी प्रतिभा की पहल से संवर रहा भिक्षावृत्ति करने वाले बच्चों का बचपन


अजय कृष्ण श्रीवास्तव ’ वाराणसी1उन मासूमों के हाथों में कटोरा था। भीख मांगना उनकी नियति थी। सुबह अपने जैसे बच्चों को स्कूल जाते देख मन में सवाल कौंधते थे। अब इनकी जिंदगी बदल गई है। नए सांचे में ढल रही है, बचपन को एक मकसद मिल चुका है। वे प्रतिभा की तालीम से भविष्य को सुंदर बनाने में जुटे हुए हैं। ऐसे करीब 80 बच्चे हैं, जिनकी जिंदगी शिक्षा की लौ से रोशन हो रही है। प्रतिभा सिंह बच्चों को पढ़ा-लिखा कर इनका भविष्य गढ़ने में जुटी हुई हैं।


बकौल प्रतिभा, इन बच्चों को सड़कों पर भिक्षा मांगते देखती थी तो मन विचलित हो उठता था। सोचती थी कि बच्चों की तस्वीर और तकदीर कैसे बदली जा सकती है। एक दिन राह मिल ही गई। वह राह थी शिक्षा। भिक्षा मांगने वाले कुछ बच्चों को पढ़ने के लिए तैयार किया, पढ़ाने के लिए उन्हें अपने घर बुलाया। उन्हें नहला कर साफ कपड़े पहनाकर उन्हें भरपेट खाना खिलाया, फिर उनके अंदर पढ़ाई के प्रति जुनून पैदा किया।


जब ये बच्चे एबीसीडी सीख गए तो मनोबल और बढ़ गया। अब ऐसे बच्चों को अपने पास प्रतिदिन छह घंटे रखती हूं। उन्हें यूकेजी स्तर तक के लिए तक प्रशिक्षित करती हूं। प्रतिभा बताती है कि वे बच्चों को अपने हाथ से बनाकर भरपेट पोषक नाश्ता कराती हैं। इस मुहिम में अब तक सफल हूं। 80 बच्चे भिक्षावृत्ति पूर्णत: छोड़ चुके हैं। गत छह सालों में ऐसे 37 बच्चों का दाखिला विभिन्न कान्वेंट स्कूलों में करा चुकी हैं।


विद्यालयों से माफ कराया शुल्क : इन बच्चों का पढ़ाई निर्बाध जारी रहे इसके लिए प्रतिभा विद्यालय प्रबंधन से अनुरोध कर पूरा शुल्क माफ कराती हैं। किताब-कापी व ड्रेस का बंदोबस्त भी संबंधित विद्यालयों के माध्यम से होता है। अब तो यह कारवां बढ़ता ही जा रहा है। हालांकि अपनी क्षमता को देखते हुए मैं हर वर्ष 20 बच्चों को ही प्रशिक्षित करती हूं।


बाल भिक्षुक पुनर्वास केंद्र बनाने का सपना : प्रतिभा बताती हैं कि भिक्षा मांगने वाले बच्चों की जिंदगी संवारने को बाल भिक्षुक पुनर्वास केंद्र बनाने की योजना है, ताकि ऐसे बच्चे न सिर्फ अच्छी शिक्षा पा सकें, अपितु काउंसिलिंग के माध्यम से उनके परिवार के सदस्यों को भी जोड़कर विभिन्न विधाओं में प्रशिक्षित कर रोजगार उपलब्ध कराया जा सके। उन्होंने नेवादा, सुंदरपुर स्थित आवास पर अपनी माताजी के नाम उर्मिला देवी मेमोरियल सोसाइटी नामक संस्था बनाई है। संयुक्त परिवार से आने वाले प्रतिभा सिंह इस नेक काम में अपनी बचत और पति के सहयोग के अलावा अन्य किसी से आर्थिक मदद नहीं लेतीं।


बचपन बचाओ आंदोलन से जुड़ा नाता : प्रतिभा की नेक पहल को देखते हुए विभिन्न सामाजिक संगठनों के अलावा प्रदेश सरकार ने नारी शक्ति सम्मान देकर उनका मनोबल बढ़ाया। नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने अपने संगठन बचपन बचाओ आंदोलन से उन्हें जोड़ा है।


बुनियादी शिक्षा की बुनियाद कमजोर : प्रतिभा का कहना कि देश में बुनियादी शिक्षा की बुनियाद कमजोर है। सरकारी विद्यालयों से लोगों का भरोसा उठ सा गया है। निजी स्कूल महंगे होने के कारण गरीब बच्चों से दूर है। हालांकि, देश में उच्च शिक्षा की स्थिति कुछ हद तक ठीक है।


प्रशिक्षित शिक्षकों की जरूरत : शहर केस्कूलों में शिक्षक उपलब्धता औसत ठीक है। प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव है। प्रतिवर्ष बेलगाम होती फीस औसत कमाई वाले घरों का बजट बिगाड़ दे रही है, ऐसे में शुल्क पर अंकुश रखना होगा। स्कूलों की अपेक्षा सरकारी कॉलेज, विश्वविद्यालयों की शिक्षा गुणवत्ता औसत या औसत से बेहतर कही जा सकती है।ऐसे करें भागीदारी



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