विकास के दौर में जमीन पर हो रही पढ़ाई

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विकास के दौर में जमीन पर हो रही पढ़ाई

प्राथमिक विद्यालय में हैंडपंप व शौचालय का अभाव

ओड़वारा,बस्ती: साउंघाट विकास खंड के प्राथमिक विद्यालय खझौला पुरवा की हालत ठीक नहीं है। वर्ष 2015 में स्थापित इस विद्यालय में दो कक्षा कक्ष,एक रसोईघर,प्रधानाध्यापक कक्ष,एक बरामदा के अलावा अन्य कुछ भी नहीं है। बाउंड्रीवाल, सरकारी नल, शौचालय का आज भी अभाव है। प्रधानाध्यापक अशोक कुमार चौधरी का कहना है कि अन्य सुविधाओं के लिए कई बार अधिकारियों लिखित सूचना दी गई लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। कुछ दिन पहले विद्यालय में आई जांच को भी इस बात को लेकर हैरानी हुई कि अभी तक इस विद्यालय में शौचालय, और सरकारी नल का अभाव है। वर्तमान में इस विद्यालय में 40 बच्चों का नामांकन है। एक सहायक अध्यापिका,दो रसोइया हैं। अगर दिन में किसी को शौचालय जाना हो तो या तो गांव में किसी के घर जाएं या आसपास में खेत का सहारा लें। विद्यालय में एक अदद हैंडपंप न होने के कारण रसोइया गांव से पानी लाकर भोजन बनाती हैं। भोजन के बाद बच्चे गांव जाकर पानी पीते हैं। ग्राम प्रधान ने भी कई बार लिखित सूचना दी पर परिणाम शून्य रहा। अभी कुछ दिन पहले रसोईघर दरवाजा टूट कर अलग हो गया है। वर्तमान समय में मध्याह्न भोजन कक्षा कक्ष में बन रहा है। बच्चों को बरामदे में बैठा कर पढ़ाया जा रहा है। अभी कुछ दिन पहले एक किशोर ट्रैक्टर लेकर विद्यालय से गुजर रहा था अचानक ट्रैक्टर विद्यालय के बरामदे के पिलर को तोड़ते हुए बरामदे तक चला गया संयोग था कि बच्चों की छुट्टी हो चुकी थी नहीं तो बड़ा हादसा हो जाता। प्रधानाध्यापक अशोक कुमार चौधरी का कहना है कि वह अधिकारियों को लिख कर थक चुके हैं। कोई सुनने वाला नहीं है।

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जागरण संवाददाता, बस्ती : चहुंओर विकास का शोर गूंज रहा है। इस दौर में भी बच्चे जमीन पर बैठकर पढ़ाई कर रहे हैं। परिषदीय विद्यालयों का यही हाल है। जमाना बदल गया लेकिन यहां पढ़ाई की परंपरा नहीं बदली। मध्याह्न भोजन और ड्रेस वितरण योजना पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं, बच्चों के बैठने का इंतजाम नहीं बन पा रहा है। कहीं टाट पट्टी पर पढ़ाई हो रही तो कहीं फर्श पर ही बच्चे बैठ रहे हैं। पढ़ाई का स्तर भी किसी से छिपा नही है। सवाल है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था बदइंतजामी में कब तक घसीटी जाएगी। वर्ष 2000 के दशक में विद्यालयों की बाढ़ आ गई। जनपद में परिषदीय विद्यालय हजार से बढ़कर 2386 पहुंच गए। भवन, चहारदीवारी की भी व्यवस्था बनी। लेकिन जिनके लिए यह सब हुआ वह अभी मूलभूत सुविधा से वंचित हैं। स्कूलों में उनके बैठने के लिए कोई इंतजाम नहीं है। आजादी के 70 साल बाद भी परिषदीय बच्चों के हक में टाट पट्टी ही रह गई। कहीं- कहीं वह भी गायब है। शासन स्तर पर इन स्कूलों के लिए बेंच और कुर्सी का बजट निर्धारित नहीं है। जिससे यह विद्यालय इस दौर में भी फर्नीचर विहीन हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधि भी सरकारी स्कूलों में बच्चों को फर्नीचर की व्यवस्था सुलभ कराने में रुचि नहीं रखते।

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निजी विद्यालयों में पहुंच गई अत्याधुनिक सुविधाएं: विभाग भले ही निजी स्कूलों को कोप का शिकार बनाता है। मगर असलियत में जितनी सुविधाएं बच्चों को निजी स्कूलों में मिल रही हैं वह सरकारी स्कूलों में अभी तक नहीं पहुंचीं। छोटे- बड़े सभी स्कूलों का पहला मानक कुर्सी, बेंच और भवन है। इसके अतिरिक्त पंखा और सीसीटीवी कैमरा भी कुछ निजी स्कूलों में है। पढ़ाई का स्तर भी यहां सरकारी स्कूलों से कहीं ज्यादा बेहतर है। कांवेंट बच्चों की पढ़ाई की तुलना कुछ चुनिंदे परिषदीय बच्चों से ही किया जा सकती है। अधिकांश सरकारी स्कूलों के बच्चों की शिक्षा भगवान भरोसे है। भारी भरकम बजट खर्च होने के बाद भी परिषदीय स्कूलों में फर्नीचर नहीं हैं।

प्रशिक्षु आइएएस ने की थी पहल: परिषदीय स्कूलों में फर्नीचर की सुविधा पहुंचाने की कवायद इस जिले में प्रशिक्षु आइएएस चंद्र मोहन गर्ग ने छेड़ी थी। जिसकी वजह से लगभग डेढ़ दर्जन विद्यालय इस सुविधा से आच्छादित हो गए। लेकिन उनके जाने के बाद यह मुहिम बंद हो गई। आइएएस गर्ग छह माह पूर्व साऊंघाट ब्लाक के बीडीओ का कार्यभार देख रहे थे। उन्होंने विकास क्षेत्र के ग्राम प्रधानों के साथ बैठक कर स्कूलों में कुर्सी और बेंच की व्यवस्था करने पर सहमति बनाई। लक्ष्य रखा गया कि सौ विद्यालय ग्राम पंचायत निधि से फर्नीचर की सुविधा से आच्छादित किए जाएंगे। डेढ़ दर्जन विद्यालय में यह व्यवस्था बन भी गई। लेकिन इसी बीच वह स्थानांतरित हो गए। फिर यह अभियान ठंडे बस्ते में चला गया। सदर विकास क्षेत्र में चार स्कूल इस सुविधा से लगभग आच्छादित हुए हैं।

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