शिक्षा की रोशनी से जीवन संवार रहे मुसहर बच्चे

शिक्षा की रोशनी से जीवन संवार रहे मुसहर बच्चे
Shiksha ki raushani se jiwan sanwaar rahe mushar bachche

पढ़ाई से दूर रहने वाले अभिभावक व बच्चों को भा रही कक्षाएं

उमेश पाठक ’ गोरखपुर
सतीश का जीवन जंगल में दिनभर पत्ते बीनकर ही बीत रहा था। स्कूल क्या होता है, शिक्षा से क्या फायदा होगा, इसका इल्म न तो उसे था और न ही उसके घर वालों को। पर, मुख्यधारा से भटके हुए इस बच्चे को गुरु मिल गए। परिषदीय विद्यालय में उसका दाखिला हुआ और धीरे-धीरे सुधार भी दिखने लगा। इस साल सतीश ने हाईस्कूल की परीक्षा 67 फीसद से अधिक अंकों के साथ उत्तीर्ण की है।

सतीश के व्यवहार में हुआ यह बदलाव मुसहर समाज के बच्चों के लिए सुखद परिणाम लेकर आ रहा है। उनका जीवन शिक्षा की रोशनी से रोशन होने लगा है।उमेश पाठक ’ गोरखपुर 1सतीश का जीवन जंगल में दिनभर पत्ते बीनकर ही बीत रहा था। स्कूल क्या होता है, शिक्षा से क्या फायदा होगा, इसका इल्म न तो उसे था और न ही उसके घर वालों को। पर, मुख्यधारा से भटके हुए इस बच्चे को गुरु मिल गए। परिषदीय विद्यालय में उसका दाखिला हुआ और धीरे-धीरे सुधार भी दिखने लगा। इस साल सतीश ने हाईस्कूल की परीक्षा 67 फीसद से अधिक अंकों के साथ उत्तीर्ण की है।

सतीश के व्यवहार में हुआ यह बदलाव मुसहर समाज के बच्चों के लिए सुखद परिणाम लेकर आ रहा है। उनका जीवन शिक्षा की रोशनी से रोशन होने लगा है।लगातार प्रयासों के बाद मिली सफलता1ब्रह्मपुर क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय विश्वनाथपुर में मुसहर समाज के बच्चों की संख्या 120 से अधिक है। यह संख्या तब है जब स्कूल की दूरी मुसहर आबादी बौरिहवा टोला से ढाई किलोमीटर से अधिक है। दो और परिषदीय विद्यालय नजदीक हैं, लेकिन इस समाज का विश्वास दूर वाले विद्यालय पर है। इस विश्वास को बनाने में विद्यालय के शिक्षक अभय पाठक के कठिन व निरंतर प्रयास का महत्वपूर्ण योगदान है। 2010 में इस विद्यालय पर उनके तैनात होने के समय बौरिहवा टोले से करीब 50 बच्चों का नामांकन था, लेकिन उनमें मुसहर बच्चे काफी कम थे। अभय स्कूल से निकली जागरूकता रैली के साथ जब बस्ती में पहुंचे तो वहां की दयनीय स्थिति ने अंदर तक झकझोर दिया। यहां रहने वाले अन्य लोग मुसहर समाज के लोगों से बात करना पसंद नहीं करते थे। छोटे-छोटे बच्चे नशे की लत में थे। अन्य शिक्षकों ने बताया कि काफी प्रयास के बाद भी कोई पढ़ाई में रुचि नहीं लेता। नामांकन हो भी जाए तो बच्चे जंगल में चले जाते हैं, स्कूल नहीं आते। अभय को भी वहां कुछ खास तवज्जो नहीं मिली। पर, हार न मानकर ऐसे लोगों की तलाश की जो बच्चों को पढ़ाना चाहते थे। कुछ लोग मिले और उनके बच्चों का प्रवेश हुआ।

धीरे-धीरे एक-दूसरे को देख अन्य बच्चे भी वहां आने लगे। अभय आज भी कुछ दिनों के अंतराल पर बस्ती में जाना और अभिभावकों से मिलना नहीं भूलते। उनके प्रधानाध्यापक डॉ. सीबी तिवारी व शिक्षक सनोज चौहान, अवधलाल पटेल का भी खूब सहयोग मिलता है।स्कूल में पढ़ते मुसहर बच्चे (फाइल फोटो)स्वच्छता के प्रति भी हो रहे जागरूक

मुसहर बस्ती में गंदगी एक बड़ी समस्या रही है। पर, लगातार कुछ सालों से स्कूल आने वाले बच्चों में साफ-सफाई को लेकर जागरूकता आई है। उनके कपड़े साफ होते हैं और घर पर भी इसका प्रभाव दिखता है।बच्चे करते हैं पढ़ाई की बात1शिक्षकों की सात साल की मेहनत का असर यह है कि मुसहरों के बच्चे फक्र से बताते हैं कि वे घर पर भी पढ़ाई जरूर करते हैं। सतीश के अलावा सुनील, नितेश, सचिन, विशाल, तप्तेश, अंजू, खुशबू, राजनंदनी, शैलेन्द्र, रबीश, सिंटू, सूरज आदि बच्चे इस विद्यालय से कक्षा पांच पास कर आगे की पढ़ाई कर रहे हैं। मुसहर बच्चे न केवल हिंदी में बात कर रहे हैं, बल्कि कक्षा तीन व चार के बच्चे अंग्रेजी की किताब पढ़ने में भी सक्षम हैं। अभिभावक सुरेंद्र, भगवती, सियाराम आदि का कहना है कि विद्यालय के शिक्षकों के कारण हमारे बच्चे पढ़ाई में मन लगा रहे हैं।

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